ह्रदय रोग के कारण ,लक्षण और बचाव के उपाय और क्या खाये क्या नहीं :-

 

हम आपको हृदय शूल या एनजाइना पैन क्या होता है और यह दिल के दौरे से किस तरह अलग है और दिल का दौरा पड़ने पर क्या खाये और क्या नहीं , क्या करे और क्या नहीं के बारे में बताने जा रहे है | दिल के दौरे से किस तरह बचाव किया जा सकता है? और अर्जुन की छाल के प्रयोग से किस तरह ह्रदय रोगो को दूर करे, के बारे में बताने जा रहे है |

हृदय शूल तथा दिल का दौरा :-

हृदय रोगों का सबसे प्रमुख कारण है – हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों का संकरा और सख्त हो जाना | रक्त में जब वसा यानि कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक हो जाती है तो अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल हृदय की धमनियों के भीतर दीवारों पर जमा होने लगता है और धमनियों के भीतर निरंतर वसा की परत जमने की प्रक्रिया के परिणाम स्वरुप धीरे-धीरे धमनियों का Narrow यानि संकीर्ण और कड़ा हो जाना प्रारंभ हो जाता है तथा उनमें उभार बन जाते हैं जिससे रक्त प्रवाह का मार्ग संकरा और अवरुद्ध हो जाता है | हृदय की मांसपेशियों को अपना कार्य यानि प्रसारण एवं संकुचन या पंपिंग करने के लिए शुद्ध रक्त की लगातार जरूरत होती है जिसकी आपूर्ति हृदय की धमनियों से मिलती है |
यदि किसी कारणवश खासकर रक्त की धमनियों के भीतर चिकनाई की परत दर परत जमते जाने और धमनियों का भीतरी व्यास कम हो जाने के कारण, इन धमनियों में संकीर्णता या आंशिक अवरोध उत्पन्न हो जाता है तो ऐसी अवस्था में हृदय को रक्त की आपूर्ति पूरी तरह से न होकर बहुत ही कम मात्रा में और बाधित रूप में होती रहती है | विश्राम की अवस्था में रोगी का किसी तरह काम चलता रहता है और रोग की प्रारंभिक अवस्था में उसे दिल के रोग के कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते परंतु जब रोगी को कोई शारीरिक परिश्रम जैसे दूर तक पैदल चलना, सीढ़ियां चढ़ना, दौड़ लगाना आदि करना पड़े तो शारीरिक श्रम के दौरान प्रारंभिक लक्षण जैसे छाती में दर्द उठना, कंधे और पीठ में दर्द होना, भारीपन प्रतीत होना, दम घुटना, छाती में संकुचन आदि महसूस होते हैं क्योंकि दिल को अधिक परिश्रम करने के लिए अतिरिक्त यानी सामान्य से ज्यादा रक्त की आवश्यकता होती है जो की ऊपर बताई गई प्रक्रिया से रक्त की आपूर्ति में कमी आ जाने से उसे मिल नहीं पाता और परिणाम स्वरुप हृदय की मांसपेशियों जोर से सिकुड़ती है और छाती में दर्द यानी चेस्ट पेन का अनुभव होता है | इस दर्द को हृदय शूल या एनजाइना पेरिस कहा जाता है | अधिक मानसिक परिश्रम और तनाव भी हृदय शूल का कारण बन सकते हैं |

 

ऊपर बताया गया ह्रदय शूल यानि चेस्ट पैन हार्ट अटैक नहीं है मगर हार्ट अटैक की चेतावनी है | आइये जानते है हार्ट अटैक के लक्षण :-

 

रोग की अवस्था में जब रक्त की धमनियों की त्वचा परत जम जाने से वह पूर्ण रूप से अवरुद्ध या बंद हो जाती है या खून का थक्का यानी ब्लड क्लॉट बन जाने से धमनियों में रक्त प्रवाह का मार्ग एकाएक अवरुद्ध हो जाता है और हृदय को ऑक्सीजन युक्त रक्त मिलना बिल्कुल बंद हो जाता है तब छाती में अचानक असहनीय दर्द उठता है जिसे दिल का दौरा यानी हार्ट अटैक कहते हैं | विश्राम की दशा में भी यह दर्द बना रहता है | एंजाइना यानी हृदय शूल का दर्द थकान के कारण होता है और विश्राम करने से दूर हो जाता है और उससे रक्तचाप व दिल के धड़कन पर खास प्रभाव न पड़े तो घबराने की कोई बात नहीं होती, परंतु यदि यदि थकान से शुरू हुआ दर्द विश्राम के बाद भी समाप्त नहीं होता और दर्द निवारक औषधियां जैसे सार्बिट्रेटे, नाइट्रोग्लिसरीन आदि भी असर ना करें तो समझना चाहिए कि दिल का दौरा पड़ रहा है और चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए और गंभीरता से उपचार करना चाहिए और तत्काल आगे बताई गई अपान वायु मुद्रा का अभ्यास करना शुरू कर देना चाहिए |
दिल के दौरे के पहचान आगे बताए गए लक्षणों से भी पहचान की जा सकती है |

  • रोगी को घबराहट होना
  • सांस लेने में तकलीफ होना
  • दिल की अनियमित धड़कन
  • दिल में तेज पीड़ायुक्त झटके महसूस होना
  • पसीना छूटना
  • चक्कर आना
  • जी मचलाना
  • बेहोशी छाना या बहुत ज्यादा कमजोरी का अनुभव होना आदि |

 

हार्टअटैक का प्रभावशाली इलाज अपान वायु मुद्रा :-

यदि किसी को हार्टअटैक का हृदय रोग एकाएक आरंभ हो जाए तो अपान वायु मुद्रा को बिना वक्त गवाएं करने से इंजेक्शन से भी अधिक प्रभावशाली रूप से हार्ट अटैक

को तत्काल रोका जा सकता है |  हार्ट अटैक को रोकने के लिए यह एक रामबाण प्रयोग है | हृदय रोग को जैसे हृदय की घबराहट, हृदय की तेजी या मंदगति, ह्रदय का धीरे-धीरे बैठ जाना आदि जैसी परेशानियों में कुछ ही क्षणों में यह मुद्रा लाभ देती है |

अपान वायु मुद्रा :-

अंगूठे के पास वाली पहली उंगली को अंगूठे की जड़ से लगाकर अंगूठे के अग्र भाग को बीच की दोनों उंगलियों के अगले सिरों से लगा दे सबसे छोटी उंगली को अलग रखें | इस स्थिति का नाम अपानवायु मुद्रा है |

इसके अतिरिक्त दिल का दौरा पड़ने के लिए कुछ अनुवांशिकता कारण भी होते है जैसे :-

  • जहां रोगी के माता पिता में किसी एक को या दोनों की मृत्यु दिल के दौरे से हुई हो, वहां ज्यादा सचेत रहने की आवश्यकता है |
  • तथाकथित उच्च स्तरीय जीवन प्रणाली, विलासितापूर्ण रहन सहन, कुर्सी पर बैठे रहने और रिमोट कंट्रोल की सहायता से चलने वाली श्रम रहित जिंदगी, प्रतियोगिता के युग में भागादौड़ी और तनावपूर्ण जीवन शैली के कारण आजकल मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, पेप्टिक अल्सर, मानसिक व हृदय संबंधी बीमारियां अधिक बढ़ रही है |
  • हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि दिल का दौरा पड़ने की संभावना आम आदमी के मुकाबले में यदि लोगों के माता पिता में से किसी एक को भी दिल का दौरा पड़ा हो तो आम आदमी के मुकाबले में दुगनी और यदि दोनों हृदय रोगी से ग्रस्त रहे हो तो 4 गुनी, मधुमेह के रोगियों में दुगनी, औसत से अधिक मोटे व्यक्तियों में दुगुनी, एक ही कुर्सी पर घंटो बैठकर काम करने वालों और शारीरिक श्रम रहित दिनचर्या वालों में तीन गुनी, उच्च रक्तचाप के रोगियों में तीन गुनी, धूम्रपान करने वालों में दुगनी, प्रतिदिन 12 सिगरेट पीने वालों में 6 गुनी, धूम्रपान के साथ उच्च रक्तचाप भी हो और और कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी उच्च हो तो 8 गुनी होती है |

वास्तव में हृदय रोगों के बढ़ने का मूल कारण गलत खानपान और गलत रहन सहन यानी लाइफ स्टाइल है | आइये जानते है ह्रदय रोगो में क्या खाये क्या नहीं और क्या करे क्या नहीं :-

ह्रदय रोगो में हितकारी यानि क्या खाये :-

बेदाना अनार, आवला, आवला का मुरब्बा, सेब या सेब का मुरब्बा, अंगूर, नींबू का रस, थोड़ा उष्ण गाय का दूध, जौ का पानी (बरलीवाटर), कच्चे नारियल का पानी, गाजर, पालक, लहसुन, कच्चा प्याज, छोटी हरड़, सौंफ, मेथीदाना, किशमिश, मुनक्का, गेहूं का दलिया, चोकर, मोटा आटा, चना और जौ मिश्रित आटे की मीठी रोटी, थोड़ी मात्रा में भिगोए चने, किशमिश का नियमित सेवन, बिना पालिश के चावल, हरी सब्जियां, ताजे फल, कम चिकनाई वाले दूध से बने पदार्थ आदि |
दोनों समय भोजन के बाद ब्रजासन और थकान महसूस करने पर शवासन करें | शाकाहार, योगाभ्यास एवं अर्जुन की छाल व आंवला, हरड़ जैसी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के सेवन से हृदय रोग पास नहीं फटकते |

 

ह्रदय रोगो में अहितकारी यानि क्या न खाये :-

मांसाहार, मदिरापान यानि शराब पीना या नशा करना, धूम्रपान, तंबाकू, कॉफी, नशीले पदार्थों का सेवन त्याग दें | ज्यादा नमक, तेज मसालेदार चटपटी और गरिष्ठ पदार्थ, आधुनिक फास्ट फूड और जंक फूड, चॉकलेट, केक, पेस्ट्री, आइसक्रीम आदि | वसायुक्त चर्बी वाले पदार्थ जैसे मक्खन, घी, नारियल का तेल, प्रोसेस खाद्य पदार्थ आदि | प्रिजर्वेटिव्स दूध से बने पदार्थ, खोए की मिठाई, रबड़ी, मलाई आदि के सेवन से बचें |

 

कुछ ध्यान देने योग्य बातें :-

नियमित व्यायाम के साथ-साथ तनावरहित गहरी नींद और विश्राम तथा संयमित जीवन आवश्यक है और यही स्वास्थ्य की कुंजी है | अत्यधिक तनाव ग्रस्त रहना या भागादौड़ी (थोड़े समय में अधिक शीघ्रता से तरक्की करने की धुन) और अत्यधिक आराम पसंदगी (स्वचालित और आधुनिक सुख सुविधाओं और विलासितापूर्ण तथा कथित उच्च स्तरीय रहन-सहन को अपनाने की धुन ) दोनों ही प्रवृत्तियां उचित नहीं है |

 

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