हाई रिस्क प्रेगनेंसी केअर

हाई रिस्क प्रेगनेंसी केअर (High Risk Pregnancy Care in Hindi)- हाई रिस्क प्रेगनेंसी मां-बच्चे दोनों या दोनों में से किसी एक की सेहत के लिए खतरा बनती है। मैक्स हॉस्पिटल, गुरुग्राम की एसोसिएट डाइरेक्टर व ऑब्स्टेट्रिक्स व गाइनीकोलॉजी विभाग की हेड डॉ. दीपा दीवान व मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज की डाइरेक्टर व ऑब्स्टेट्रिक्स व गाइनीकोलॉजी विभाग की हेड डॉ. नीरा अग्रवाल विशेष जानकारियां दे रही हैं।

हाई रिस्क प्रेगनेंसी

हाई रिस्क प्रेगनेंसी का कारण चाहे जो भी हो, पर ऐसी महिलाओ को सामान्य प्रेगनेंसी की तुलना में अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। ऐसी स्तिथि में छोटी सी भी गलती माँ और बेबी दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है।

हाई रिस्क प्रेगनेंसी के करने को 2 हिस्सों में बात कर समझने की कोशिश करते है :-

  1. हाई रिस्क प्रेगनेंसी
  2. हाई रिस्क प्रेंगनेंसी के कारण
  3. हाई रिस्क प्रेगनेंसी के लक्षण | High Risk Pregnancy Ke Lakshan
  4. हाई रिस्क प्रेगनेंसी का कारण, उसके कारण पैदा होने वाली कॉम्प्लीकेशन्स और ट्रीटमेंट के उपाय
    1. लेट प्रेगनेंसी | Late Pregnancy
      1. बड़ी उम्र में गर्भधारण करने के नुकसान
      2. सही उम्र में गर्भधारण करने के फायदे
    2. बहुत दुबली या मोटी होना
      1. वजन कम होने से समस्याएं
      2. वजन अधिक होने से समस्याएं
    3. गर्भवती महिला की हेल्दी बीएमआई
    4. प्रेगनेंसी में हाई ब्लड प्रेशर
    5. प्रेगनेंसी में प्री एक्लैपसिया
    6. प्रेगनेंसी में लो ब्लड प्रेशर
    7. प्रेगनेंसी में एडिमा होना
    8. प्रेगनेंसी के समय डाइबिटीज – जेस्टेशनल डाइबिटीज
    9. प्रेगनेंसी से पहले ही डाइबिटीज हो
    10. प्रेगनेंसी में पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम
    11. प्रेगनेंसी में थायरॉइड की समस्या
    12. प्रेगनेंसी में खून की कमी
    13. प्रेगनेंसी में आरएच फैक्टर
    14. जुड़वां बच्चे

हाई रिस्क प्रेंगनेंसी के कारण

हाई रिस्क प्रेगनेंसी 2 तरह की होती हैं:-

  1. कुछ महिलाओं में पहले ही से सेहत से संबंधी समस्याओं के कारण प्रेगनेंसी में होने वाले कॉम्पलिकेशंस – जिन महिलाओं को पहले ही से हाई ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज, किडनी या दिल से जुड़ी समस्या, अस्थमा या मिरगी की समस्या हो, पहले से भी बहुत बार अबॉर्शन हो चुके हों या यूटरस से संबंधित कोई सर्जरी हुई हो, तो प्रेगनेंसी में बहुत कॉम्पलिकेशन्स आती हैं। इस तरह की प्रेगनेंसी मां और बच्चे दोनों के लिए परेशानियां पैदा कर सकती है।
  2. कई मामलों में महिलाओं में कंसीव करने के समय तक किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती। प्रेगनेंसी के कुछ समय के बाद कॉम्पलिकेशन्स आने लगते हैं – ज्यादातर महिलाओं की सेहत नॉर्मल होती है, पर कुछ कारणों से प्रेगनेंसी जोखिमभरी हो जाती हैं। इनमें उनकी उम्र का कम या अधिक होना, बहुत दुबला या अधिक वजन का होना, गर्भ में जुड़वां बच्चों का होना, शिशु का वजन तय वजन से कम या अधिक होना और सही ग्रोथ ना होना, प्रेगनेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रेशर व प्री एक्लैपसिया होना, जेस्टेशनल डाइबिटीज होना, पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम होना, खून की कमी होना, प्लेसेंटा की पोजिशन सामान्य ना होना, ब्लड में आरएच से संबंधित अबनॉर्मेलिटी व थाइरॉइड की समस्या होना आदि शामिल हैं।

हाई रिस्क प्रेगनेंसी के कारण चाहे जो भी हो, पर ऐसी महिलाओं को सामान्य प्रेगनेंसी की तुलना में अधिक देखभाल की जरूरत होती है। इस दौरान होनेवाली छोटी सी गलती मां और बेबी के लिए खतरनाक हो सकती है। प्रेगनेंट महिला के समय समय पर और नियमित रूप से जांच कराते रहने, डाइट और रूटीन का खास ख्याल रखने और सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

इस 9 महीने के सफर में प्रेगनेंट महिला को डॉक्टर की हिदायतों को पूरी तरह से मानना बहुत जरूरी होता है। किसी-किसी मामले में तो कई बार हॉस्पिटल में भरती होने की नौबत आ सकती है। तब हॉस्पिटल में जाने से ना घबराएं और घर पर रह कर अपनी मनमानी ना करें। तभी मां और बच्चा दोनों हेल्दी रह सकते हैं। इस तरह अपनी केअर करने से संतोषजनक परिणाम मिलते हैं।

हाई रिस्क प्रेगनेंसी के इन कारणों और उन्हें दूर करने के उपायों के बारे में जानने से पहले आइये जान ले हाई रिस्क प्रेगनेंसी के लक्षण।

हाई रिस्क प्रेगनेंसी के लक्षण | High Risk Pregnancy Ke Lakshan

प्रेगनेंसी में आगे बताये गए लक्षण नजर आने पर गर्भवती महिला को तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। आइये जानते है हाई रिस्क प्रेगनेंसी पर महसूस होने वाले लक्षण : –

  1. तेज बुखार जो 24 घंटे से भी अधिक समय तक बना रहे।
  2. लगातार सिर दर्द होना
  3. आराम करते समय भी सांस फूलना
  4. पेट में दर्द महसूस होना
  5. गर्भ में भ्रूण की हलचलों में कमी महसूस करना
  6. पेट में छाले होना (Gastrointestinal Ulceration)
  7. योनि से रक्तस्राव होना या सफेद पानी बहना
  8. नजर कमजोर होना, धुंधला दिखाई देना या दृष्टि में परिवर्तन होना
  9. त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना
  10. वजन तेजी से बढ़ना
  11. सूजन होना

हाई रिस्क प्रेगनेंसी का कारण, उसके कारण पैदा होने वाली कॉम्प्लीकेशन्स और ट्रीटमेंट के उपाय

आइये अब डिटेल में समझते है हाई रिस्क प्रेगनेंसी के कारण और उन्हें दूर करने के उपाय और सावधानिया :-

लेट प्रेगनेंसी | Late Pregnancy

गर्भधारण करने वाली महिला की उम्र महिला 18 वर्ष से कम है या फिर 35-40 के बीच है, तो उसे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। बड़ी उम्र में गर्भ धारण करने पर उनमें से ज्यादातर की समय से पहले डिलीवरी (37 सप्ताह) हो सकती है। 35 वर्ष या उससे अधिक उम्र में पहली बार गर्भ धारण करने को ‘एल्डरली प्राइमी’ कहा जाता है। आजकल युवतियों के कैरिअर कॉन्शस होने की वजह से वे 30-35 की उम्र में गर्भधारण कर रही हैं। ऐसे में हाई रिस्क प्रेगनेंसी हो जाती है। उम्र के इस दौर में हाई ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज और थाइरॉइड जैसी बीमारियां होने की आशंका अधिक होती हैं।

45 वर्ष की महिला के प्रेगनेंट होने पर हर 40 में से 1 महिला के बच्चे को डाउन सिंड्रोम (जेनेटिक डिस्ऑर्डर) हो सकता है। जबकि 40 वर्ष से कम आयु की महिला में इस तरह का बच्चा पैदा होने की आशंका 100 में से 1 होती है। बेबी को डाउन सिंड्रोम होने पर वह मेंटली रिटार्टेड पैदा होता है। उसका मानसिक विकास नहीं हो पाता।

बड़ी उम्र में गर्भधारण करने के नुकसान

• बड़ी उम्र में प्रेगनेंट होने पर लेबर पेन लंबा चल सकता है। कई बार बड़ी उम्र में यूटरस स्लो हो जाता है व पूरी तरह से काम नहीं कर पाता। उसमें जरूरी संकुचन नहीं हो पाता, इससे बच्चे को जन्म देने में कठिनाई आ सकती है। तब ऑपरेशन से डिलीवरी कराने के आसार बढ़ जाते हैं। डिलीवरी के बाद भी बच्चेदानी पूरी तरह से नहीं सिकुड़ती और ब्लीडिंग की आशंका बनी रहती है।

• ज्यादा उम्र होने पर फर्टिलिटी भी कम हो कर समस्या बन जाती है लेकिन प्रेगनेंसी के बाद 9 महीने के सफर आसानी से अंजाम दे पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अबॉर्शन या अबनॉर्मल बेबी के पैदा होने की आशंका होती है।

सही उम्र में गर्भधारण करने के फायदे

• बच्चे को जन्म देने की सही उम्र 21 से 30 वर्ष है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यूटरस ठीक से काम करता है, जिससे नॉर्मल डिलीवरी होने की अधिक संभावना होती है।

• इस उम्र में प्रेगनेंसी होने पर डाइबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर होने के आसार कम होते हैं।

• सही उम्र में ही मां स्वस्थ बेबी को जन्म दे सकती है।

• उम्र के इस दौर में एनर्जी से भरपूर होती है। इस कारण बेबी को जन्म देने पर वह उसकी सही ढंग से परवरिश कर पाती है।

बहुत दुबली या मोटी होना

प्रेगनेंसी में वजन बहुत कम होने या जरूरत से ज्यादा होने पर प्रेगनेंसी हाई रिस्क हो जाती है।

वजन कम होना – कुछ महिलाएं अपनी बॉडी को स्लिम ट्रिम बनाए रखने के चक्कर में डाइटिंग करती हैं। ऐसे में शरीर में पोषक तत्वों व खून की कमी हो जाती है और ये महिलाएं एनीमिया की शिकार हो जाती हैं।

वजन कम होने से समस्याएं

  • इससे बेबी कम वजन का पैदा हो सकता है।
  • उसमें प्रोटीन की कमी हो सकती है।
  • प्रीटर्म डिलीवरी हो सकती है और
  • बेबी को नर्सरी में रखने की जरूरत पड़ सकती है।
  • बेबी को बड़ी उम्र में सेहत संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

वजन कम होने पर अपनी होम डाइट से सुधार लाये जैसे :-

  • घर का बना संतुलित आहार लें।
    वेजिटेरियन हैं, तो दूध, दही, प्रोटीन व सारे फल लें। पपीता ना खाएं।
    नॉन वेजिटेरियन हैं, तो घर का बना हेल्दी नॉनवेज खाएं।
  • बाहर का खाना खाने से गैस्ट्रोएंटेराइटिस होने का डर रहता है। इसलिए ध्यान रखें।

वजन अधिक होने से समस्याएं

  • वजन ज्यादा होने पर टांगों में ब्लड क्लॉट बन सकते हैं, जिसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहते हैं।
  • यह क्लॉट फेफड़ों में भी जा सकता है। इसे पल्मोनरी थ्रोम्बोसिस कहते हैं।
  • जेस्टेशनल डाइबिटीज होने का खतरा अधिक होता है। यह एक तरह की डाइबिटीज होती है, जो डिलीवरी के बाद अपने आप दूर हो जाती है, लेकिन आगे चल कर महिला को ओबेसिटी व डाइबिटीज हो सकती है।
  • बढ़े वजन की वजह से हाई ब्लड प्रेशर, प्री एक्लैंपसिया और डिलीवरी के समय अधिक परेशानी की आशंका रहती है।

गर्भवती महिला की हेल्दी बीएमआई

डॉक्टर बताते हैं कि बीएमआई ज्यादा होने के बावजूद हेल्दी प्रेगनेंसी हो सकती है। बीएमआई 18.5 से ऊपर और 25 से नीचे होना चाहिए। कई महिलाओं को लगता है कि उन्हें प्रेगनेंसी में दो लोगों के जितना खाना खाना चाहिए, जबकि यह सोच बिलकुल गलत है। प्रेगनेंसी में 8 -12 किलो तक वजन का बढ़ना सही माना जाता है।

जिन महिलाओं का बीएमआई अधिक होता है, उनको कोशिश करनी चाहिए कि प्रेगनेंसी के समय उनका वजन 5-9 किलो से अधिक नहीं बढ़े, तो सही है।

डाइट क्या हो:

  • हेल्दी डाइट और एक्सरसाइज से वजन को कंट्रोल कर सकते हैं।
  • इसमें एक्टिव लाइफस्टाइल का होना बहुत जरूरी है।
  • जंक फूड व तला-भुना खाने से परहेज करें।
  • सोडा ड्रिंक्स ना लें।
  • नीबू पानी पिएं।

प्रेगनेंसी में हाई ब्लड प्रेशर

प्रेगनेंसी समय पर ब्लड प्रेशर रीडिंग जानना जरूरी है। इससे माँ और बच्चे की सेहत का अंदाजा लगाया सकता है।

ब्लड प्रेशर हाई होने कॉम्पलिकेशन्स

  • प्लेसेंटा भरपूर पोषक तत्वों और ऑक्सीजन की सप्लाई ना पाने से इसका असर बच्चे ग्रोथ पर पड़ सकता है और बच्चा बौना पैदा सकता है।
  • ब्लड प्रेशर तेजी बढ़े तो बच्चे का जीवन खतरे में सकता है।
  • माँ और बच्चे सेहत ध्यान रखते हुए ३७ सप्ताह से पहले डिलीवरी की जरूरत पड़ सकती है। इस तरह प्रीमैच्योर बेबी का जन्म हो सकता है।

प्लेसेंटा का अलग होना :- प्लेसेंटा समय से पहले यूटरस की दीवार से अलग हो सकती है, जिससे को ब्लीडिंग होने लगती और कुछ मामलों में समय पहले डिलीवरी करानी पड़ सकती है।

इलाज क्या है :- डॉक्टर जो दवा दे, उसे समय पर खाएं।

होम डाइट से सुधार:- खाने में नमक लेना पूरी तरह से बंद ना करें, पर ऊपर से नमक ना लें। अचार, पापड़ खाने से परहेज करें। सलाद में ऊपर से नमक मिला कर ना खाएं।

प्रेगनेंसी में प्री एक्लैपसिया

इसमें प्रेगनेंसी के दौरान हाई ब्लड प्रेशर की स्थिति बन जाने पर एक या एक से अधिक अंग असामान्य ढंग से काम करने लगते हैं। अगर ब्लड प्रेशर 130 एमएम एचजी/ 90 एमएम एचजी के जितना या उससे ज्यादा है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह करें।

प्रेगनेंसी में रूटीन चेकअप के दौरान प्री एक्लैपिसया के बारे में पता चल जाता है। सीवियर प्री एक्लैपसिया होने पर हाई ब्लड प्रेशर के अलावा जो लक्षण जाहिर होते हैं, वे इस प्रकार हैं :-

  • चेहरे, हाथ और पैरों में सूजन आना।
  • सिर दर्द का लगातार बने रहना और सामान्य पेनकिलर से भी दूर ना होना।
  • देखने में कठिनाई होना। धुंधला नजर आना
  • आंखों के सामने काले धब्बे नजर आना।
  • पसलियों के नीचे तेज दर्द होना।
  • एसिडिटी की समस्या होना।

प्री एक्लैपसिया का पता लगाने के टेस्ट:

  • स्त्री रोग विशेषज्ञ इस तरह की शिकायत होने पर प्रेगनेंट महिला का ब्लड प्रेशर चेक करते हैं।
  • ब्लड और यूरिन का टेस्ट इन टेस्ट से पता चलता है कि लिवर और किडनी कितना सही ढंग से काम कर रहे हैं। ब्लड में क्लॉटिंग कितनी सही ढंग से हो रही है।
  • बच्चे की हार्ट बीट मॉनिटर की जाती है। अल्ट्रासाउंड से बेबी की सेहत व ग्रोथ का पता लगाया जाता है।

इलाज क्या हो :

  • ब्लड प्रेशर को दवाओं से कंट्रोल किया जाता है, लेकिन प्री एक्लैंपसिया में आराम बेबी बर्थ के बाद मिलता है।
  • 37 सप्ताह या उससे अधिक समय का गर्भ है, तो तय समय से पहले डिलीवरी कर दी जाती है, ताकि प्री एक्लैंपसिया की वजह से मां व बेबी की सेहत को किसी तरह का नुकसान ना पहुंचे। 37 सप्ताह से कम समय की प्रेगनेंसी है, तो प्रेगनेंट महिला को डॉक्टरों की देखरेख में रखा जाता है। कोशिश होती है कि महिला किसी तरह से 37 सप्ताह या उससे थोड़ा अधिक का समय पूरा कर लें।
  • महिला के ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए और उसके ऑर्गन्स को नुकसान पहुंचे या फिर बच्चे के अस्वस्थ होने की आशंका हो, तो डॉक्टर प्रीमैच्योर डिलीवरी की सलाह देते हैं, भले ही बच्चे ने मां के गर्भ में 37 सप्ताह पूरे ना भी किए हों। यह बहुत कुछ प्री एक्लैपसिया की स्थिति पर निर्भर करता है।

प्रेगनेंसी में लो ब्लड प्रेशर

प्रेगनेंसी में हारमोनल बदलाव से ब्लड प्रेशर लो हो सकता है। ब्लड प्रेशर की रीडिंग 90 एमएम एचजी/ 60 एमएम एचजी या उससे कम आए, तो ब्लड प्रेशर लो माना जाता है।

प्रेगनेंसी की शुरुआत में ब्लड प्रेशर कम होना शुरू होता है और दूसरी तिमाही के बीच के समय के दौरान सबसे कम होता है। तीसरी या आखिरी तिमाही में यह अपने आप बढ़ने लगता है।

तीसरी तिमाही में यूटरस के फैल जाने से खून की नलिकाओं में पड़ने वाले प्रेशर की वजह से ब्लड प्रेशर लो हो सकता है। लंबे समय तक लेटे रहने या नींद से उठने व कुर्सी से उठने पर कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर लो हो सकता है और चक्कर आने, हल्का सिर दर्द होने व धुंधला दिखाई देने की समस्या होती है।

इसके अलावा एनीमिया और ब्लड शुगर लेवल के कम होने पर भी प्रेगनेंसी में ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। प्रेगनेंसी में बेबी मां के शरीर से ही पोषक तत्वों को लेता है। मां को विटामिन या फोलिक एसिड की कमी की वजह से एनीमिया हो, तो इसका असर खून के दौरे पर पड़ सकता है और उसका ब्लड प्रेशर कम हो सकता है।

ब्लड प्रेशर कम होने पर मां को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है, छाती में दर्द हो सकता है, उल्टी आने, नाड़ी तेज से चलने की शिकायत सकती है।

कॉम्पलिकेशन्स:

प्रेगनेंसी सामान्य तौर ब्लड का कम होना अस्थायी स्थिति मानी जाती है। लेकिन प्रेगनेंसी शुरुआत लो ब्लड प्रेशर साथ में तेज दर्द हो, तो ट्यूब की प्रेगनेंसी सकती है, इसलिए रहते जांच करा लेनी चाहिए।

प्रेशर बहुत कम हो जाए, मां के शरीर में ऑक्सीजन सप्लाई कम हो जाती है और इसका असर बच्चे पर पड़ता है।

होम डाइट से सुधारः

  • डाइट नमक की मात्रा बढ़ा देने से आराम मिलता है। नमक से मिलनेवाला सोडियम ब्लड प्रेशर को बढ़ाता है। नमक बहुत ज्यादा भी न लें, इससे भी सेहत को नुकसान पहुंच सकता है। सबसे आसान तरीका यह है कि आधा छोटा चम्मच नमक पानी में मिला कर पीने के लिए दें।
  • रातभर पानी में भीगी किशमिश सुबह खाली पेट खाने के लिए दें।
  • तुलसी की पत्तियों से जूस निकाल कर उसे शहद के साथ चाटने के लिए दें। तुलसी में विटामिन सी, मैगनीशियम, पोटैशियम, पॅटोथेनिक एसिड होते हैं, लो बीपी में इसे लेने से फायदा होता है। इससे तनाव भी दूर होता है।
  • अपनी डाइट में फाइबर का स्तर सही रखें। हरी पत्तेदार सब्जियां व दलिया को डाइट में शामिल करें।

प्रेगनेंसी में एडिमा होना

प्रेगनेंसी में कई बार एडिमा होने पर प्रेगनेंसी के आखिर के महीनों में टखनों और पैरों के आसपास सूजन आ जाती है। लंबे समय तक खड़े रहने और नमक ज्यादा मात्रा रहने से यह समस्या होती है। इस दौरान ज्यादा कॉफी भी नहीं पीनी चाहिए।

सूजन का मुख्य कारण शरीर में पानी का इकट्ठा होना है। प्रेगनेंसी के दौरान खून में जो बदलाव आते हैं, उसकी वजह से टिशूज में फ्लूइड चला जाता है, जिससे बढ़े हुए यूटरस में तनाव पैदा होता है और पैरों पर प्रेशर पड़ता है।

गरमी के मौसम में यह समस्या ज्यादा होती है। ज्यादा टाइट कपड़े ना पहनें। फुटवेअर आरामदायक हो। सॉफ्ट स्लिपर्स पहनें, तो बेहतर होगा। रोज 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं। इससे शरीर के सिस्टम में जमा अतिरिक्त नमक निकल जाएगा।

प्रेगनेंसी के समय डाइबिटीज – जेस्टेशनल डाइबिटीज

प्रेगनेंसी में डाइबिटीज हो जाए, तो इसे जेस्टेशनल डाइबिटीज कहते हैं। प्रेगनेंसी में इंसुलिन की अतिरिक्त जरूरत होती है, जब शरीर इस जरूरत को पूरा नहीं कर पाता, तो खून में ग्लूकोज का स्तर अधिक हो जाता है और जेस्टेशनल डाइबिटीज हो जाती है। जो आपकी प्रेगनेंसी को हाई रिस्क प्रेगनेंसी बना देती है।

इंसुलिन ऐसा हारमोन है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है। सामान्य तौर पर जेस्टेशनल डाइबिटीज प्रेगनेंसी के बीच के या आखिर के समय में शुरू होती है।

यह आमतौर पर उन महिलाओं को होती हैं, जो :-

  • ओवरवेट या मोटी और शारीरिक रूप से एक्टिव नहीं होतीं।
  • जिन्हे पहली प्रेगनेंसी में भी जेस्टेशनल डाइबिटीज हो।
  • जब बेबी अधिक वजन का पैदा हुआ हो। अधिक वजन यानी नवजात का 4 किलो या उससे अधिक वजन का होना।
  • पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम हो।
  • जेस्टेशनल डाइबिटीज में मां के शरीर से बेबी को जरूरत से अधिक शुगर मिलती है। इस वजह से बच्चे का वजन बढ़ जाता है। अधिक वजन का बेबी होने से मां को बहुत अधिक कॉम्पलिकेशन्स आती हैं। इसमें बच्चे के जन्म लेने में दिक्कत होती है। सिजेरियन ऑपरेशन से बच्चा करते हैं। डिलीवरी के बाद अत्यधिक ब्लीडिंग होती है। नॉर्मल डिलीवरी हुई हो, तो वेजाइना या वेजाइना से एनस तक के बीच का हिस्सा कट-फट जाता है।
  • जेस्टेशनल डाइबिटीज होने पर आगे चल कर मां व बच्चे, दोनों को टाइप 2 डाइबिटीज होने का खतरा होता है।

ट्रीटमेंट :-

  • प्रेगनेंसी के दौरान डाइबिटिक मां को अधिक देखभाल की जरूरत होती है।
  • महिला को ब्लड शुगर लेवल का खासतौर से ध्यान रखना होता है। इस लेवल को कंट्रोल में रखना जरूरी होता है। अपनी व बच्चे की सेहत के चेकअप के लिए बार बार डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। इससे मां और शिशु, दोनों के लिए खतरा कम हो जाता है।
  • प्रेगनेंट महिलाओं के हेल्दी डाइट लेने और नियमित रूप से एक्सरसाइज करने से ब्लड शुगर कंट्रोल में आ जाती है।
  • कई महिलाओं को ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए दवा के अलावा कभी-कभी इंसुलिन देने की भी जरूरत पड़ सकती है। साथ ही डाइट और एक्सरसाइज का भी ध्यान रखना होता है।

प्रेगनेंसी से पहले ही डाइबिटीज हो

एक्सरसाइज :-

रोजाना व्यायाम करना ब्लड शुगर के स्तर की सामान्य रेंज में बनाए रखने में मददगार है। सामान्य तौर पर 30 मिनट की हल्की / मध्यम गति की एरोबिक एक्सरसाइज सप्ताह में 5 दिन करने की सलाह दी जाती है।
सैर करना सभी गर्भवती महिलाओं के लिए बेहतरीन एक्सरसाइज है। एरोबिक एक्सरसाइज के अलावा हर बार खाना खाने के बाद 10-15 मिनट के लिए सैर करें। इससे ब्लड शुगर कंट्रोल करने में आसानी होगी।

टेस्ट:

बेबी की मां के गर्भ में हेल्थ को जानने के लिए स्पेशल टेस्ट किए जाते हैं। इस टेस्ट से पता लगा सकते हैं कि बेबी को सेहत से जुड़ी कौन सी समस्याएं हो सकती हैं। तब समस्या को दूर करने के लिए कदम उठा सकते हैं।

फीटल मूवमेंट काउंटिंग (किक काउंट्स) : इसमें रेकॉर्ड रखा जाता है कि बेबी दिन कितनी बार मूवमेंट करता है। हेल्दी बेबी की मूवमेंट हर रोज लगभग बराबर ही रहती हैं।

नॉनस्ट्रेस टेस्ट: इस टेस्ट से बेबी की मूवमेंट के दौरान उसके दिल में आनेवाले बदलावों के बारे में पता लगाया जाता है। नॉनस्ट्रेस से मतलब है कि बेबी पर किसी तरह का स्ट्रेस नहीं डाला गया है। मां के पेट पर एक बेल्ट बांध दी जाती है, जिस पर सेंसर लगा होता है। सेंसर से आनेवाली बेबी की हार्ट रेट को मशीन रेकॉर्ड करती जाती है।

इस टेस्ट में बच्चे का हार्ट रेट टेस्ट (नॉनस्ट्रेस टेस्ट) और अल्ट्रासाउंड से जांच की जाती है। इसमें पता लगाया जाता है कि एम्नियोटिक फ्लुइड कितनी मात्रा में है। बेबी की ब्रीदिंग, मूवमेंट और मसल्स की भी जांच की जाती है।

होम डाइट से सुधार:

मीठे फल जैसे आम, केला, चीकू, अंगूर आदि ना खाएं। दूध व चाय में चीनी ना मिलाएं। हरी सब्जियां खाएं। सबसे जरूरी है कि समय-समय पर खाएं। ऐसा नहीं है कि गर्भवती महिला अपनी मरजी से कभी भी खा सकती है। कुछ भी

महिला पहले से ही डाइबिटिक है, तो अपनी 3 महीने की ब्लड शुगर की रेकॉर्डिंग जिसे Hb A1C कहते हैं, चेक करे। उसके बाद प्रेगनेंसी बायोफिजिकल प्रोफाइल (बीपीपी) प्लान करे। ब्लड शुगर ज्यादा हो, तो बेबी में दिक्कतें हो सकती हैं। इसमें महिलाओं को इंसुलिन देना पड़ता है।

प्रेगनेंसी में पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम

पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस होने पर महिलाओं में इन्फर्टिलिटी की समस्या देखने में आती है। महिला कंसीव कर ले, तो बच्चे के विकास पर असर पड़ सकता है। जो आपकी प्रेगनेंसी को हाई रिस्क प्रेगनेंसी बना देती है। यह समस्या आजकल बढ़ती जा रही है।

कॉम्पलिकेशन्स :-

  • प्रेगनेंसी की शुरुआत में ही मिसकैरिज होने का खतरा एक स्वस्थ महिला की तुलना में तीन गुना अधिक होता है।
  • इन महिलाओं में प्रेगनेंसी के दौरान जेस्टेशनल डाइबिटीज (प्रेगनेंसी के दौरान डाइबिटीज होने, जैसा कि ऊपर बताया गया है) और प्री एक्लैपसिया (ब्लड प्रेशर का अचानक बढ़ जाना) होने का खतरा होता है।
  • इसमें प्रीटर्म बर्थ होने के आसार होते हैं।
  • पीसीओएस की वजह से जेस्टेशनल डाइबिटीज हो, तो बड़े साइज के बेबी की वजह से सिजेरियन ऑपरेशन से डिलीवरी करानी पड़ सकती है।
  • प्री एक्लैपसिया होने पर प्रेगनेंसी के 20 सप्ताह के बाद अचानक से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। इसका असर मां की किडनी, लिवर और ब्रेन पर पड़ सकता है। इसलिए डॉक्टर समय से पहले सी-सेक्शन से बेबी की डिलीवरी करा सकते हैं।
  • पीसीओएस की वजह से प्रेगनेंसी में हाई ब्लड प्रेशर हो सकता है। इसका इलाज ना किया जाए, तो प्री एक्लैपसिया हो सकता है। इससे प्रीटर्म बर्य (37 सप्ताह से पहले) हो सकता है। इस तरह के बेबी को सेहत से जुड़ी कई तरह की समस्याएं हो सकती है।
  • पीसीओएस होने पर प्रेगनेशी हो जाए, तो अपने डॉक्टर की हिदायतों को जरूर मानें।

होम डाइट से सुधार :-

  • अपना वजन जरूरत से ज्यादा ना बढ़ाएं।
  • जंक फूड व तली चीजों से परहेज करें। फल-हरी सब्जियां खाएं।
  • महिला ओवरवेट है और उसे पीसीओएस है, तो उसे अपनी कैलोरी इनटेक पर ध्यान देना होगा। महिला का वजन कंट्रोल में है, तो उसे प्रेगनेंसी के शुरू के 3 महीनों में एक्स्ट्रा कैलोरी की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरी तिमाही में रोज 300 एक्स्ट्रा कैलोरी, तीसरी तिमाही में 500 एक्स्ट्रा कैलोरी काफी है।

प्रेगनेंसी में थायरॉइड की समस्या

कई महिलाओं की प्रेगनेंसी से पहले या प्रेगनेंसी के दौरान थाइरॉइड ग्लैंड सही ढंग से काम नहीं कर पाता। इससे उनमें हाइपोथायरॉइडिज्म या हाइपरथायरॉइडिज्म की समस्या हो सकती है। जो आपकी प्रेगनेंसी को हाई रिस्क प्रेगनेंसी बना देती है।

इसका समय पर इलाज कराना जरूरी है, ताकि थायरॉइड ग्लैंड से स्राव ढंग से हो सके। यह गरदन में स्थित एंडोक्राइन (अंतःस्रावी) ग्लैंड है। इससे निकलनेवाले हारमोन शरीर के मेटाबॉलिज्म को बनाए रखते हैं। हारमोन ज्यादा स्रावित हो, तो हाइपोथायरॉइडिज्म और कम हो, तो हाइपरथायरॉइडिज्म होता है।

हाइपोथायरॉइडिज्म के कॉम्पलिकेशन्स:

  • बेबी के न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिकाओं के) विकास के लिए थायरॉइड का ठीक रहना जरूरी है।
  • इसका महिला की फर्टिलिटी व प्रेगनेंसी पर असर पड़ता है। इससे अबॉर्शन और समय से पहले डिलीवरी हो सकती है।
  • जन्म के समय बेबी का वजन कम हो सकता है। गर्भवती महिला का ब्लड प्रेशर कंट्रोल से बाहर हो सकता है।

हाइपरथायरॉइडिज्म

इसमें मां का वजन बढ़ने की बजाय कम होता है और उसका पल्स रेट बढ़ जाता है। इसका मां और बेबी की सेहत पर असर पड़ सकता है।

टेस्ट:

  • थायरॉइड हारमोन के स्तर का पता लगाने के लिए टीएसएच यानी थायरॉइड स्टिम्युलेटिंग, हारमोन टेस्ट कराना जरूरी होता है।
  • इसके लिए खून की जांच की जाती है।
  • थायरॉइड का स्तर संतुलित स्तर. से ज्यादा निकले, तो डॉक्टर तुरंत महिला के लिए थायरॉइड रिप्लेसमेंट ट्रीटमेंट शुरू कर देते हैं। इसमें सुबह खाली पेट खाने के लिए हारमोन टेबलेट्स दी जाती हैं। थायरॉइड का स्तर कम निकले, तो इसके फंक्शन को कंट्रोल करने के लिए दवा दी जाती है।

ट्रीटमेंट क्या हो:

  • प्रेगनेंसी में थायरॉइड होने पर डॉक्टर बार-बार हारमोन स्तर की जांच करवाते हैं। प्रेगनेंसी के पीरियड के अनुसार इन दवाओं की खुराक बढ़ायी घटायी जाती है। डिलीवरी हो जाने के बाद यह खुराक कम हो सकती है। एक बार खुराक बदलने के 6-8 सप्ताह बाद टीएसएच स्तर की जांच कराएं।
  • प्रेगनेंसी में थायरॉयड हारमोन को नियंत्रित करने के लिए समय पर इलाज, एक्सरसाइज व सही डाइट का लेना जरूरी है।

एक्सरसाइज :- सुबह-शाम 15-20 मिनट के लिए सैर करें।

हाइपोथायरॉइडिज्म का होम डाइट से सुधार :-

  • आयोडीन युक्त नमक डॉक्टर की सलाह से लें।
  • तली-भुनी चीजें ना खाएं।
  • सूप, ताजे फलों का जूस पिएं।

प्रेगनेंसी में खून की कमी

प्रेगनेंसी में महिलाओं में खून की कमी हाई रिस्क प्रेगनेंसी का कारण बनती है। यह कमी डाइट में आयरन ना मिल पाने, अबॉर्शन, इन्फेक्शन जैसे कई कारणों से हो सकती है।

प्रेगनेंसी का आधा समय गुजर जाने के बाद शरीर अधिक मात्रा लाल रक्त कोशिकाएं बनाने लगता है, ताकि मां और बेबी की आयरन की जरूरत को पूरा किया जा सके। प्रत्येक रक्त कोशिका आयरन का इस्तेमाल करती है। शरीर खुद आयरन नहीं बना सकता है। खाने-पीने की चीजों में मिलनेवाले आयरन से शरीर की जरूरत को पूरा किया जा सकता है।

आयरन बहुत सारी चीजों में मिलता है, पर शरीर को इसे जज्ब करने में कठिनाई आ सकती है। प्रेगनेंसी में शरीर को जरूरत के हिसाब से आयरन नहीं मिल पाने से लाल रक्त कोशिकाएं कम मात्रा में बनती हैं और एनीमिया हो जाता है।

इसी तरह हेल्दी रक्त कोशिकाओं के लिए पोषक तत्व फोलेट की जरूरत होती है। फोलेट शरीर आसानी जज्ब हो जाता है।

खून में आयरन की कमी होने पर सांस लेने दिक्कत होती और थकान महसूस होती है। महिला बहुत अधिक एनीमिक हो, तो दिल से जुडी समस्या भी हो सकती है।

प्रेगनेंसी में हीमोग्लोबिन का स्तर 11-13 यूनिट होना जरूरी है। खून की आसान जांच से इस बारे में पता लगाया जा सकता है। प्रेगनेंसी में महिला को रोज लगभग 30 मि.ग्रा. आयरन जरूरत होती है।

कॉम्पलिकेशन्स :-

  • प्रीमैच्योर डिलीवरी व बेबी का वजन कम होने की आशंका होती है।
  • फोलिक एसिड की कमी होने पर बच्चे में पैदाइशी विकार आ सकते है।
  • एनीमिया होने पर डिलीवरी के समय बहुत अधिक ब्लीडिंग होने और बच्चे में भी आयरन के रिजर्व पर्याप्त मात्रा में ना होने की आशंका होती है।

ट्रीटमेंट :-

खून की बहुत कमी होने पर आयरन के इन्जेक्शन दिए जा सकते और कभी-कभी खून चढ़ाने तक की नौबत आ जाती है।

होम डाइट से सुधार :-

  • आयरन से भरपूर चीजें जैसे मीट, चिकन, फिश, पत्तेदार सब्जियां, गुड़, किशमिश, राजमा, फलियां खाये।
    मीट मिलनेवाला आयरन सब्जियों में मिलनेवाले आयरन की तुलना आसानी से जज्ब जाता है। गर्भवती नॉनवेजिटेरियन है, तो मीट खाए
    आयरन टेबलेट्स को डेरी प्रोडक्ट्स या कैल्शियम सप्लीमेंट्स के साथ ना ले। आयरन पचने में कठिनाई होगी।
    फोलिक एसिड से भरपूर चीजें जैसे बीन्स, हरी पत्तेदार सब्जियां और ऑरेंज खाएं।
    विटामिन सी से भरपूर ताजे सिट्रस फल व सब्जियां खाएं।
  • ऐसी प्रीनेटल मल्टीविटामिन और मिनरल्स पिल्स लें, जिनमें फोलेट अतिरिक्त मात्रा में हो।

प्रेगनेंसी में आरएच फैक्टर

मां का आरएच नेगेटिव और पिता का आरएच पॉजिटिव है, तो बेबी का आरएच गर्भ में पॉजिटिव हो सकता है। इससे प्रेगनेंसी में बहुत कॉम्पलिकेशन्स आती हैं। इस स्थिति को आरएच इनकम्पैटेबिलिटी कहते हैं। आरएच फैक्टर एक तरह का प्रोटीन हैं, जो लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मिल सकता है। किसी महिला की रक्त कोशिकाओं में यह प्रोटीन है, तो वह आरएच पॉजिटिव है। यह प्रोटीन नहीं है, तो वह आरएच नेगेटिव है।

आरएच पॉजिटिव बेबी का खून आरएच नेगेटिव मां के खून से मिल जाए, तो मां के शरीर को लगता है कि यह उसका खून नहीं है और वह एंटी आरएच एंटीबॉडीज बनाने लगता है। यह एंटीबॉडीज प्लेसेंटा में पहुंच कर बेबी के खून को नष्ट कर सकती हैं। इस तरह का रिएक्शन होने पर बेबी को गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम्स हो सकती हैं या बेबी की मां के गर्भ में या जन्म लेते समय मृत्यु हो सकती है।

सामान्य तौर पर प्रेगनेंसी में माँ और बेबी का खून आपस में एक दूसरे से मिलते नहीं है। लेकिन कई बार लेबर और जन्म के समय बेबी का खून मां के खून से मिल सकता है।

कॉम्पलिकेशन्स :-

  • गर्भ में बेबी को एनीमिया हो जा सकता है। इसमें जितनी तेजी से लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट होती हैं, उतनी तेजी से शरीर उनकी पूर्ति नहीं कर पाता। लाल रक्त कोशिकाएं ही पूरे शरीर में ऑक्सीजन ले कर जाती हैं। इन कोशिकाओं के ना होने पर बेबी को पूरी तरह से ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और कई बार उसकी गर्भ में ही मृत्यु हो जाती है।
  • सामान्य तौर पर आरएच नेगेटिव महिला को आरएच पॉजिटिव बेबी के साथ पहली प्रेगनेंसी में कोई दिक्कत नहीं होती। तब उसके शरीर में बहुत ज्यादा एंटीबॉडीज बनने का ख़तरा नहीं होता। पहली प्रेगनेंसी में ही इसके बचाव के लिए ट्रीटमेंट ना लिया जाए, तो दोबारा प्रेगनेंट होने पर गर्भ में आरएच पॉजिटिव बच्चे के साथ बहुत ज्यादा एंटीबॉडीज बनने का खतरा रहता है।
  • आरएच नेगेटिव महिला का पहला अबॉर्शन हो जाए या एक्टोपिक प्रेगनेंसी हो, तब इसका ट्रीटमेंट लेना जरूरी है। ऐसा ना करने पर दूसरी बार प्रेगनेंट होने पर बच्चे के आरएच पॉजिटिव होने पर उसके लिए खतरा पैदा हो सकता है।

टेस्ट :

  • ब्लड टेस्ट से खून के ग्रुप और आरएच के बारे में पता लगाया जा सकता है। प्रेगनेंसी के बाद जब महिला पहली बार डॉक्टर के पास जाती है, तभी यह टेस्ट किया जाता है।
  • दूसरी तरह का ब्लड टेस्ट एंटीबॉडी स्क्रीन कहलाता है। इससे पता चल जाता है कि क्या आरएच नेगेटिव महिला का खून आरएच पॉजिटिव खून के प्रति एंडीबॉडीज बना सकता है।

ट्रीटमेंट :-

प्रेगनेंसी की शुरुआत में ही डॉक्टर एंडीबॉडीज बनने से रोकने की दवा देते हैं। यह दवा प्रेगनेंसी के लगभग 27वें सप्ताह में, आरएच पॉजिटिव बच्चे के जन्म लेने के 72 घंटों के अंदर व एक्टोपिक प्रेगनेंसी या पहली तिमाही में गर्भपात या अबॉर्शन के बाद दी जाती है।

गर्भ में मां का शरीर एंटीबॉडीज बना दे और बेबी आरएच पॉजिटिव हो, तब क्या करें :

  • डॉक्टर सबसे बेबी की हेल्थ चेक करते हैं। बेबी को बहुत अधिक एनीमिया है, तो समय से पहले (37 सप्ताह से पहले) डिलीवरी करना जरूरी होता है।
  • दूसरा तरीका यह है कि बेबी के मां के गर्भ होने पर उसे अम्बिकल कॉर्ड के जरिए खून चढ़ाया जाए।
  • बेबी को माइल्ड एनीमिया है, तो समय पर ही डिलीवरी करायी जाती है। डिलीवरी के बाद बेबी की रक्त कोशिकाओं को बदलने के लिए खून चढ़ाने की जरूरत हो सकती है।

जुड़वां बच्चे

प्रेगनेंसी की शुरुआत में अल्ट्रासाउंड से गर्भ में जुड़वां बच्चे होने के बारे में पता चलता है। जुड़वां भी दो तरह के हो सकते हैं। पहला, दोनों एक ही लिंग के हों, यानी दोनों लड़के या लड़कियां हॉ। दूसरा, विपरीत लिंगवाले बच्चे एक साथ हों। इसमें प्रेगनेंट महिला को ज्यादा परेशानियां आती हैं।

कॉम्पलिकेशन्स:

  • इसमें प्रीमैच्योर डिलीवरी होने का खतरा अधिक होता है। प्रेगनेंट महिला को डिलीवरी के बाद प्री एक्लैंपसिया और डाइबिटीज होने की आशंका अधिक होती है। इसमें दोनों बच्चों के विकास पर असर पड़ सकता है। सामान्य तौर पर पहले बच्चे की सेहत ठीक रहती है, पर दूसरा बच्चा उसके मुकाबले में थोड़ा कमजोर हो सकता है।
  • डिलीवरी के दौरान महिला को ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है। इसमें सिजेरियन ऑपरेशन से बेबी बर्थ होने के अधिक चांस होते हैं।
  • जुड़वां बच्चे होने से मां की प्लेसेंटा अबनॉर्मल हो सकती है। वह बच्चेदानी के मुंह तक भी आ सकती है। इससे कभीकभार प्रेगनेंसी के दौरान उसमें से ब्लीडिंग हो सकती है। ऐसे हो जाए, तो डिलीवरी जल्दी कराने की नौबत आ सकती । प्लेसेंटा नीचे हो, तो मां और बच्चे दोनों के लिए खतरा हो सकता है। तब डॉक्टर मां को बेड रेस्ट करने की हिदायत देते हैं। कई बार तो महिला को हॉस्पिटल में भरती होना पड़ता है।

डिलीवरी के बाद:

  • मां बच्चे को पेट भर कर ब्रेस्ट फीड कराए। शुरुआत में बच्चे को ब्रेस्ट फीड कराने में कठिनाई आ सकती है। कभी-कभी निप्पल क्रैक हो जाते हैं। तब डॉक्टर से पूछ कर मेडिसिन लगाए या फिर निप्पल शील्ड का इस्तेमाल करे। निप्पल शील्ड से दूध ना पिला पाए, तो दूध को कटोरी में निकाल कर चम्मच से पिलाए।
  • दूध पिलाते समय ध्यान रखे कि ब्रेस्ट में बहुत ज्यादा दूध जमा ना होने पाए। ऐसा होने पर ब्रेस्ट में एप्सिस होने का डर रहता है। बच्चे का पेट भर गया है और वह दूध नहीं पिए, तो दूध निकाल कर कटोरी में फ्रिज में रखे।
  • दूध पर्याप्त मात्रा में ना निकले, तो डॉक्टर से पूछ कर दवा ले।
  • ब्रेस्ट फीड करानेवाली मां पौष्टिक तत्वों से भरपूर भोजन करे। अपनी डाइट में कैल्शियम का खासतौर से ध्यान रखे। कैल्शियम के अलावा आयरन, बी कॉम्पलेक्स डॉक्टर से पूछ कर ले, ताकि वह स्वस्थ रहे।
  • ड्राई फ्रूट आदि खूब खाए। गोंद के लड्डू सीमित मात्रा में खा सकती है। डिलीवरी के बाद शरीर की मालिश कराए। सिजेरियन ऑपरेशन से डिलीवरी हुई है, तो पेट का हिस्सा छोड़ कर टांगों, हाथों की मसाज कराए।
  • मां और बच्चे का कमरा साफ सुथरा रखें, ताकि किसी तरह का इन्फेक्शन ना हो।

दोस्तों, हाई रिस्क प्रेगनेंसी केअर (High Risk Pregnancy Care in Hindi) पर लिखा गया ये लेख के पत्रिका से लिया गया है। इस लेख में दी गई जानकारी बहुत ही फायदेमंद, अटैक्टिवे, जानकारी से भरपूर और बढ़िया लगी इसलिए यह जानकारी हम आपके लिए ले कर आये है।

इस लेख को पड़ने के बाद अगर आपको मेरी बात सही लगती है तो इसे आप अन्य लोगो के साथ भी शेयर करे ताकि वे भी इसका भरपूर फायदा उठा सकते और माँ और बच्चे के स्वास्थ्य को बनाये रखने में कामयाब हो।

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